About Maa Baglamukhi Mandir

30Jun'20

नलखेड़ा ( आगर मालवा ). आगर मालवा जिले के नलखेड़ा में लखुंदर नदी के तट पर स्थित है मां बगलामुखी का भव्य मंदिर। यह मंदिर धार्मिक व तांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां का र्मिची हवन दुनियाभर में तंत्र साधना और अपने पर आए कष्टों को दूर करने के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि जिस नगर मे मां बगलामुखी विराजित हो, उस को संकट देख भी नहीं पाता। बताते हैं यहां स्वयंभू मां की मूर्ति महाभारतकाल की है। यहां युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के निर्देशन पर साधना कर कौरवों पर विजय प्राप्त की थी। यह स्थान आज भी चमत्कारों के कारण जाना जाता है। देश-विदेश से कई साधु-संत तंत्र साधना करते हैं। मां बगलामुखी वह शक्ति है जो रोग शत्रुकृत अभिचार तथा समस्त दुखों व पापों का नाश करती है। इस मंदिर में त्रिशक्ति मां विराजित है। ऐसी मान्यता है कि मध्य में मां बगलामुखी, दाएं मां लक्ष्मी तथा बाएं मां सरस्वती हैं। त्रिशक्ति मां का मंदिर भारतवर्ष में दूसरा कहीं नहीं है। बेलपत्र, चंपा, सफेद, आंकडे, आंवले तथा नीम एवं पीपल (एकसाथ) स्थित हैं। यह मां बगलामुखी के साक्षात होने का प्रमाण हैं। मंदिर के पीछे लखुंदर नदी (पुरातन नाम लक्ष्मणा) के किनारे कई संतों की समाधियां जीर्णक्षीर्ण अवस्था में हैं। यह मंदिर में बड़ी संख्या में संतों के रहने का प्रमाण है।
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16 खंभों का 250 साल पुराना सभामंडप
मंदिर परिसर में 16 खंभों वाला सभामंडप है, जो 252 साल पहले संवत 1816 में पंडित ईबुजी दक्षिणी कारीगर श्री तुलाराम ने बनवाया था। इसी सभा मंडप मे मां की और मुख करता एक कछुआ है, जो यह सिद्ध करता है कि पुराने समय में मां को बलि चढ़ाई जाती थी। मंदिर के ठीक सम्मुख लगभग 80 फीट ऊंची दीपमालिका है। कहा जाता है कि इसका निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था। मंदिर प्रांगण मे ही एक दक्षिणमुखी हनुमान का मंदिर, एक उत्तरमुखी गोपाल मंदिर तथा पूर्वमुखी भैरवजी का मंदिर भी है। मुख्य द्वार सिंहमुखी भी अपने आप में अद्वितीय है।
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यह है मां का स्वरूप
मां बगलामुखी में भगवान अर्धनारीश्वर महाशंभों के अलौलिक रूप का दर्शन मिलता है। भाल पर तीसरा नेत्र व मणिजडि़त मुकुट व चंद्र इस बात की पुष्टि करते हैं। बगलामुखी को महारुद्र (मृत्युंजय शिव) की मूल शक्ति के रूप में माना जाता है। वैदिक शब्द बग्ला है उसका विकृत आगमोक्ता शब्द बगला अत मां बगलामुखी कहा जाता है। भगवती बगला अष्टमी विद्या है। आराधना श्री काली, तारा तथा षोडशी का ही पूर्व क्रम है। सिद्ध-विद्या-त्रयी में पहला स्थान है। मां बगलामुखी को रौद्र रूपिणी, स्तभिंनी, भ्रामरी, क्षोभिनी, मोहनी, संहारनी, द्राविनी, जिम्भिनी, पीतांबरा, देवी त्रिनेभी, विष्णुवनिता, विष्णु-शंकर भमिनी, रुद्रमूर्ति, रौद्राणी, नक्षत्ररूपा, नागेश्वरी, सौभाग्य-दायनी, सुत्र संहार, कारिणी सिद्ध रूपिणी, महारावन-हारिणी परमेश्वरी, परतंत्र, विनाशनी, पीत-वासना, पीत-पुष्प-प्रिया, पीतहारा, पीत-स्वरूपिणी, ब्रह्मरूपा कहा जाता है।
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इसलिए चढ़ाते हैं पीली वस्तुएं
मां की उत्पत्ति के विषय में प्राण तोषिनी में शंकरजी पार्वती को इस प्रकार बताया है-एक बार सतयुग में विश्व को विनिष्ट करने वाला तूफान आया। इसे देखकर जगत की रक्षा में परायण श्री विष्णु को चिंता हुई। तब उन्होंने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंचकर तपस्या शुरू की। उस समय मंगलवार चतुर्दशी को अद्र्ध रात्रि के समय माता बगला का अविर्भाव हुआ। त्रैलोक्य स्तभिनी महाविधा भगवती बगला ने प्रसन्न होकर श्रीविष्णु को इच्छित वर दिया, जिसके कारण विश्व विनाश से बच गया। भगवती बगला को वैष्णव तेजयुक्त ब्रह्मामास्त्र-विद्या एवं त्रिशक्ति भी कहा गया है। ये वीर रात्रि है। कालिका पुराण में लिखा है की सभी दसमहाविधाएं सिद्ध विघा एवं प्रसिद्ध विद्या है इनकी सिद्धि के लिए न तो नक्षत्र का विचार होता है और न ही कलादिक शुद्धि करनी पड़ती है। ना ही मंत्रादि शोधन की जरूतर है। महादेवी बगलामुखी को पीत-रंग (पीला) अत्यंत प्रिय है। यही कारण है की मां को ये पीली वस्तुएं चढ़ाई जाती है।


मध्यप्रदेश के आगर-मालवा जिले की नलखेड़ा तहसील में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है, एक ऐसा मंदिर जहां शक्ति के जागृत दर्शन होते हैं। यह पहले शाजपुर जिले में आता था। अब आगर-मालवा जिला बन गया है। माता बगलामुखी के मंदिर (Temple of Mata Bagulamukhi) में आकर भक्त के केवल कष्ट ही दूर नहीं होते बल्कि उसके शत्रुओं का नाश हो जाता है। माता के दरबार में बड़ी संख्या पर श्रद्धालु पहुंचते हैं। जहां आम दर्शनार्थी अपनी मनोकामना लेकर आते हैं वहीं नेता-अभिनेता और अन्य हस्तियां मुकदमों, महत्वपूर्ण मसलों और चुनावों में जीत की कामना (Wishing to win elections) लेकर आते हैं।

माता बगलामुखी की स्वयंभू मूर्ति है, धर्मराज युधिष्ठिर ने मंदिर बनवाया था कम ही लोग जानते हैं कि महाभारतकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों के खिलाफ युद्ध में जीत के लिए पांडवों को पूजा करने का आदेश दिया था। जिसके बाद पांडवों ने यहां तपस्या की, फलस्वरूप यहां देवी शक्ति का प्राकट्य हुआ। माता ने पांडवों को कौरवों पर जीत का आशीर्वाद दिया था। पांडवों में बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने माता का आशीर्वाद पाने के बाद यहां मंदिर का निर्माण किया। मान्यता यह भी है कि माता बगलामुखी की मूर्ति स्वयंभू है। बताया जाता है कि ईस्वी सन् 1816 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।

माता बगलामुखी का पूजन (Mata Bagulamukhi ka poojan) यूं तो आम लोग भी करते हैं, लेकिन माता की विशेष साधना तांत्रिक विधि से होती है। जिसके लिए नियमों में रहकर पूजन किया जाना जरूरी है। माता को पीले रंग से प्रसन्न किया जाता है। बगलामुखी के साधक विशेषकर पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं। माता का पूजन करने के लिए पीले फूल, पीली मिठाई और पीले रंग की खाद्य सामग्री का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा चुनरी, मिठाई आदि पीले रंग की पूजन सामग्री भी भक्त चढ़ाते हैं। मां बगलामुखी शत्रु स्तंभन और शत्रु नाश की देवी मानी गई हैं। माता का पूजन हल्दी की गांठ की माला के माध्यम से भी किया जाता है। माता पीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं, इस कारण उन्हें पीतांबरा (Pitambara Mata) भी कहा जाता है।

इसलिए पड़ा ऐसा नाम माता का यह नाम उनके मुख के कारण पड़ा। माता का मुख तेजस्वी है। माता बगुले के समान मुखवाली और भक्तों को अभय देने वाली हैं। यहां देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत, तांत्रिक सहित देश-विदेश के कई श्रद्धालु पूजन अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

इस मंदिर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, सरस्वती, देवी चामुंडा, भगवान श्रीकृष्ण, श्री हनुमान, श्रीकाल भैरव एवं शिव परिवार (Mata Bagalamukhi, Mata Lakshmi, Saraswati, Devi Chamunda, Lord Shri Krishna, Shri Hanuman, Srikala Bhairav and Shiva family) भी विराजमान हैं। प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से एक हैं बगलामुखी।

मां भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे खास हैं। भारत में मां बगलामुखी के तीन ही प्रमुख (Historical temples of Maa Bagalamukhi in India) ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं, जो क्रमश: दतिया (मप्र), कांगड़ा (हिमाचल) एवं नलखेड़ा जिला आगर (मप्र) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है। मप्र में तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता (Trishakti Mata) बगलामुखी का एकमात्र यह मंदिर आगर जिले की तहसील नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है।

माता बगलामुखी नलखेड़ा कैसे पहुंचे / How to reach Mata Bagulamukhi Nalkheda वायु मार्ग: नलखेड़ा के बगलामुखी मंदिर स्थल के सबसे निकटतम इंदौर का एयरपोर्ट है। यहां से सड़क मार्ग द्वारा जाना होगा। कुल दूरी करीब 160 किलोमीटर। आप उज्जैन होते हुए जाएंगे तो उत्तम होगा। रेल मार्ग: ट्रेन द्वारा देवास या मक्सी रेलवे स्टेशन पहुँचकर भी शाजापुर जिले के गाँव नलखेड़ा पहुँच सकते हैं। सड़क मार्ग द्वारा: उज्जैन, देवास या मक्सी जो भी आपके नजदीक हो, वहां तक पहुंचें और वहां से सीधे नलखेड़ा मार्ग मिलेगा। गूगल मैप की मदद ले सकते हैं। यह बिल्कुल सटीक है।

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